​सिंधी संस्कृति: सिंधु सभ्यता की विरासत और गौरवशाली इतिहास

प्रस्तावना
​सिंधी समाज दुनिया की सबसे प्राचीन और समृद्ध संस्कृतियों में से एक, सिंधु घाटी सभ्यता का उत्तराधिकारी है। 'सिंधु' शब्द से ही 'हिंदू' और 'इंडिया' जैसे शब्दों की उत्पत्ति हुई है, जो इस समाज के ऐतिहासिक महत्व को प्रमाणित करता है।
​विभाजन की भीषण पीड़ा को सहते हुए, अपनी ज़मीन और संपत्ति पीछे छोड़कर यह समाज भारत आया। शून्य से नया साम्राज्य खड़ा करने का जज्बा, कड़ी मेहनत और व्यापारिक कुशलता के बल पर सिंधी समाज ने न केवल खुद को संभाला, बल्कि भारत के आर्थिक और सामाजिक निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। 'अतिथि देवो भव' और 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' जैसे मूल्यों को जीने वाला यह समाज आज भी अपनी संस्कृति, 'झूलेलाल' भक्ति और 'सिंधीयत' के गौरव को संजोए हुए है।
​यह लेख उनकी इसी अदम्य इच्छाशक्ति, गौरवशाली इतिहास और संपन्न परंपराओं का एक संक्षिप्त परिचय है।~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
​सिंधी संस्कृति: सिंधु सभ्यता की विरासत और गौरवशाली इतिहास
​- धनंजय सोनार, अमलनेर
79728 81440
​दुनिया की सबसे प्राचीन और उन्नत संस्कृतियों में से एक 'सिंधु घाटी सभ्यता' है। इसी भूमि से उत्पन्न सिंधी समाज आज भी अपनी परंपरा, भाषा और व्यापारिक कौशल के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। हमारे राष्ट्रगान की पंक्तियाँ 'पंजाब, सिंधु, गुजरात, मराठा...' भी इस प्रांत के ऐतिहासिक महत्व को दर्शाती हैं।
​भगवान झूलेलाल सिंधी भाइयों की श्रद्धा और शक्ति के अटूट प्रतीक हैं। सिंधी समाज के आराध्य देव भगवान झूलेलाल (उडेरोलाल) का जन्म नसरपुर (अब पाकिस्तान में) माता देवकी और पिता रत्नचंद के घर हुआ था। उन्हें वरुण देव का अवतार माना जाता है। 'पल्लो' (मछली) उनका वाहन है। उन्होंने अत्याचारी शासकों से समाज की रक्षा की। आज भी उनका जन्मोत्सव 'चेटीचंड', सिंधी नववर्ष के रूप में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है।
​सिंधी भाषा और उसका महत्व  ऐतिहासिक प्रमाणों के साथ स्पष्ट होता है। यह भाषा मुख्य रूप से तीन लिपियों में लिखी जाती है: हटाई (खुदाबादी), अरबी और देवनागरी। सिंधी एक समृद्ध भाषा है जिसकी अपनी वर्णमाला है, जिसमें कुल 52 अक्षर होते हैं।
​संवैधानिक दर्जा प्राप्त सिंधी भाषा भारत का गौरव मानी जाती हैं. भारतीय संविधान में 1967 में सिंधी भाषा को आधिकारिक भाषा का दर्जा मिला।  इतिहास गवाह है कि कच्छी बोली वास्तव में सिंधी का ही एक रूप है, इसीलिए गुजरात में सिंधी भाषा को 'कच्छी' नाम से भी जाना जाता है।
​सांस्कृतिक वैभव और कला क्षेत्र मे भी ​सिंधी समाज का बडा नाम है यह समाज उत्सव प्रिय है। चालिया महोत्सव, थदड़ी, तिरमूरी, लाल लोई और महालक्ष्मी सगड़ा जैसे त्योहार समाज की धार्मिक आस्था को दर्शाते हैं। 'छैज' सिंधी समाज का प्रसिद्ध लोकनृत्य है।
​सिंधी कलाकारों ने संगीत के क्षेत्र में बड़ा योगदान दिया है। 'सारंगी' यहाँ का प्रमुख वाद्य यंत्र है। मास्टर चंदर दुनिया के सबसे लोकप्रिय सिंधी गायक माने जाते हैं। शादियों में गाए जाने वाले 'लार्डो' (लोकगीत) आज भी बेहद लोकप्रिय हैं। उसी तरह सिनेमा के क्षेत्र में भी सिंधी समाज ने अपनी छाप छोड़ी है। 'अबाणा' सिंधी भाषा की पहली फिल्म है।
​इतिहास और पराक्रम की बात करे तो बडा गौरवशाली इतिहास सामने आता है. ​सिंध प्रांत पर राज करने वाले राजा दाहरसेन एक महान और पराक्रमी शासक थे। सिंध के बाहर विदेशों में व्यापार करने वाले व्यापारियों को 'सिंधवकी' कहा जाता था, जिससे इस समाज की समृद्ध व्यापारिक विरासत का पता चलता है। 1947 के विभाजन के बाद भी सिंधी समाज ने अपनी मेहनत के दम पर शून्य से शिखर तक का सफर तय किया है।
​राजनीति और नेतृत्व में भी सिंधी समाज का बड़ा प्रभाव रहा है। लालकृष्ण आडवाणी इस समाज के सबसे प्रभावशाली राजनेता माने जाते हैं। इसके अलावा विधायक, नगर अध्यक्ष और पार्षद के रूप में भी सिंधी समाज ने देश भर में अपनी योग्यता सिद्ध की है। देश की पहली महिला मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी सिंधी समाज का गौरव हैं। खेल जगत में, 1959 में भारतीय क्रिकेट टीम के पहले सिंधी कप्तान गुलाब राय रामचंद्र बने थे।
​हर समाज की तरह सिंधी समाज भी अपनी कुलदेवी का पूजन करता है। प्रसिद्ध शक्तिपीठ 'हिंगलाज माता' मंदिर सिंधी समाज की कुलदेवी का स्थान है। प्रकृति के साथ भी इस संस्कृति का गहरा नाता है। एशिया की सबसे बड़ी नदी 'सिंधु नदी' इस संस्कृति की जीवनरेखा है। इसके अलावा, दूध उत्पादन के लिए प्रसिद्ध 'लाल सिंधी' गायों के संरक्षण हेतु उत्तराखंड के देहरादून में एक विशेष केंद्र बनाया गया है।
​निष्कर्ष: संक्षेप में कहें तो सिंधी समाज केवल एक समुदाय नहीं, बल्कि एक जीवंत इतिहास है। मोहन-जो-दड़ो की खुदाई में मिले अवशेष यह सिद्ध करते हैं कि यह समाज हजारों साल पहले भी सुसंस्कृत, शिक्षित और प्रगतिशील था। आज भी दुनिया भर में सिंधी समाज अपनी 'सिंधियत' को संजोए हुए प्रगति के पथ पर अग्रसर है।
​अयो लाल... झूलेलाल! 
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कृपया, अगेसित करे...
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धनंजय सोनार, अमलनेर (जलगाव)
79728 81440

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